Monday, 8 April 2013

narendar bhai modi ka bhasan


     भाइयों, 
 
मैं सबसे पहले आपसे क्षमा मांगता हूं क्योंकि  कार्यक्रम की रचना शायद 11 को तय हुई थी और मुझसे भी आग्रह था कि मैं 11 को ही कार्यक्रम में आऊं। लेकिन 11 से नवरात्रि का पर्व शुरू हो रहा है जिस कारण मेरे लिए दस दिन निकलना मुश्किल था। मेरे कारण आप सबने अपनी तारीख बदली, आपको कष्ट हुआ, फिर आपने ऑडिटोरियम में कार्यक्रम में रखना था, आपको वैन्यू चेंज करना पड़ा, आपको कष्ट हुआ, यहां भी इतने लोग खड़े हैं जिन्हें कष्ट हो रहा है मैं उसके लिए क्षमा मांगता हूं..
 
नया अनुभव शेयर कर रहा हूं, हो सकता है मेरे भाषण में भी उन चीजों की झलक दिखेगी। शायद यह मेरा पहला ऐसा प्रवचन हैं, (आप क्यों हंस रहे हैं, चलिए मुझे बाद में अपने हंसने का कारण बता देना।) कि जिस के पूर्व मुझे फेसबुक और ट्विटर पर बहुत बड़ी मात्रा में आपसे जुड़ी हुई महिलाओं ने संपर्क किया और कई सवाल पूछे और बहुत सारे सुझाव दिए। इसलिए मुझे भाषण पर बहुत ज्यादा सोचना नहीं पड़ रहा है। मैं इस प्रयोग का स्वागत कर रहा हूं।
 
मुझे खुशी है कि हमारी बहनें-माताओं के मन में सामाजिक मुद्दों पर चिंता है। मैं सोशल मीडिया तकनीक का आभारी हूं जिसके माध्यम से मैं अपनी माताओं-बहनों के मन की बात समझ पाया। मैं उनकी बात को देश के तमाम नागरिकों के सामने रख रहा हूं। मैं चाहूंगा कि जहां जा रहा हूं उन लोगों के मन में कुछ सवाल हो तो मुझे भेजे, मैं गंभीरता से उनके सवाल लूंगा। आपको भी निमंत्रण हैं, आप भी मुझे अपने सुझाव दे सकते हैं। 
 
हमारे देश में, हमारी सांस्कृतिक परंपरा में, हमारी सांस्कृतिक विरासत में मां का इंसान सबसे ऊपर होता है। मां शब्द सुनते ही श्रद्धा का भाव प्रकट होता है, जहां भी पवित्रता है वहां हमें मां नजर आती है, यह हमारे संस्कारों में है। अगर गंगा के प्रति हमारी श्रद्धा है तो हम उसे मां कहेंगे, भारत के प्रति श्रद्धा है तो भारत को भारत मां कहेंगे, गाय के प्रति श्रद्धा है तो गाय को हम गाय मां कहेंगे। सदियों से हमारे देश में मां का स्थान, नारी का स्थान सर्वोपरि माना गया है, इसमें दुविधा कभी नहीं रही। लेकिन हजारों साल की गुलामी का कालखंड में हमारे भीतर बहुत सी बुराइयां और कमियां आईं हैं, और कमियां इस रूप तक आईं है कि 18वीं सदी में बच्चों को दूध पीती करने की परंपरा शुरू हो गई, बच्चों के जन्म के साथ बच्चों को डुबो कर मारा जाने लगा। उस समय इसके सामाजिक कारण रहे होंगे, लेकिन हम कल्पना कर सकते हैं कि हद तक हमारी विकृति हो सकती है। देश आजाद होने के बाद  हमें लगता था कि मातृ गौरव की परंपरा को हम दुनिया के सामने रखेंगे, लेकिन जैसे जैसे हम ज्यादा से ज्यादा पढ़े लिखे होते गए, हमारी विकृतियां और बढ़ती गईं। 
 
कम से कम 18वी सदी में बेटी को जन्म लेने का अवसर तो मिलता था, उसे सांस लेने के कुछ पल मिलते थे, उसे अपनी मां को देखने का सौभाग्य देखना मिलता था, पल दो पल वह अपने रिश्तेदारों को देख लेती थी जिसके बाद उसे मौत के घाट उतार दिया जाता था, लेकिन आज मां के पेट में ही बेटी को मारा जा रहा है, बेटी होने वाली है इसलिए गर्भपात हो रहे हैं और इस पाप में पुरुष और स्त्रियां दोनों हैं, हम 18वीं सदी से भी पीछे चले गए हैं, यह इसका बड़ा सबूत है। 
 
यह पीड़ा हमारे राज्य में भी है, 2011 की जनगणना के आंकड़ों ने मेरे रौंगटे खड़े कर दिए, रोएं तो किसके सामने रोएं। कहें तो किससे कहें, क्या 21वीं सदी हमें सिर उठाने की इजाजत देती है? 

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