Friday, 12 April 2013

शिक्षा का अधिकार कानून लागू करने में दिक्कतें दो स्तर पर हैं एक अधोसंरचना की कमी और दूसरा शिक्षा में गुणवत्ता का अभाव। जब 
भी शिक्षा का अधिकार कानून की बात होती है तो यादातर अधोसंरचना में कमी का रोना लेकर बैठ जाते हैं। यह समझना होगा कि जिन 40 प्रतिशत स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं या जिन 33 फीसदी स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय की व्यवस्था नहीं हैं या फिर उन 39 प्रतिशत स्कूलों में जहां नि:शक्त बच्चों के लिए रैम्प का निर्माण नहीं हुआ है, वहां पर भी बच्चे पढ़ रहे हैं। स्वच्छ पेयजल, खेल के मैदान, शौचालय, बिजली, पक्की इमारत यह सब जरूरी हैं, लेकिन इन तमाम व्यवस्थाओं के बावजूद अगर बच्चों को गुणवत्तायुक्त शिक्षा नहीं मिल पा रही है तो सब व्यर्थ है। इसलिए स्कूलों में अच्छी गुणवत्ता वाली शिक्षा बच्चों को मिल सके, सरकारों के लिए यह प्राथमिकता में होना चाहिए। साथ-साथ यह भी समझना होगा कि जब अच्छी शिक्षा स्कूलों में मिलेगी तो छात्र हो या पालक स्कूल की छोटी-मोटी कमियों पर ध्यान नहीं देंगे। जब हम स्कूल में गुणवत्तायुक्त शिक्षा की बात करते हैं तो मापदण्ड वहां से पढ़कर निकले बच्चों का इंजीनियर, डॉक्टर और शासकीय अधिकारी बनने की संख्या से तय किए जाते हैं। आज समाज को अच्छे शिक्षक की भी जरूरत है चाहे वह प्रौद्योगिकी संस्थानों में हो, प्रबंधकीय संस्थाओं में या फिर प्राथमिक शालाओं में।  
देश में स्कूल स्तर पर अभी भी 11 लाख शिक्षकों की कमी है। केन्द्र सरकार ने शिक्षक नियुक्त करने के जो मानक तय किए हैं उसे पूरा करने में भी मुश्किल हो रही है। एक व्यक्ति जब स्नातक या स्नातकोत्तर की डिग्री लेकर विश्वविद्यालय से बाहर निकलता है तो उसे प्राथमिक और माध्यमिक शालाओं तक के विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए क्षमतावान मानना चाहिए लेकिन बीएड की डिग्री की अनिवार्यता है। जब कोई विद्यार्थी 3 साल  की पढ़ाई कर बच्चों को पढ़ाने की काबिलियत नहीं पैदा कर सकता तो क्या गारंटी है कि वह एक साल बीएड पढ़कर सक्षम हो जाएगा। किसी कार्य के लिए विशेष डिग्री अथवा योग्यता को निर्धारित मापदण्ड मान लिया जाता है तो फिर यह नया व्यवसाय-व्यापार को जन्म देता है। शिक्षक बनने के लिए बीएड की अनिवार्यता ने देश में हजारों निजी शालाओं में बीएड की डिग्री कोर्स की शुरुआत कर दी। सवाल यह कि इतनी संख्या में बीएड पढ़ाने के लिए  शिक्षक कहां से मिलेंगे? फिर किसी तरह साल भर पाठयक्रम चलाकर बीएड की डिग्री दे देना ही संख्या का लक्ष्य हो जाता है। इसके एवज में फिर हजारों-लाखों रुपए फीस वसूल ली जाती है। इस तरह अर्हता महंगी हो जाती है और गांव के विपन्न इस अर्हता को प्राप्त नहीं कर पाते। यह देखना होगा कि शिक्षण भी एक कला है, इसके लिए डिग्री जरूरी नहीं, बल्कि कुछ गुणों की जरूरत होती है। इसलिए अगर शिक्षा में गुणवत्ता बढ़ानी है तो स्कूलों में शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया पर पुर्नविचार करना होगा। साथ-साथ शिक्षा के अधिकार कानून को लागू करने के साथ-साथ उच्च शिक्षा में भी गुणवत्ता को सुधारने की जरूरत है। sabhar desh bandhu 

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